Ghazal Shayari Pyaar Shayari Friendship Dosti Shayari 2019


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ग़ज़ल-
हमसे रिश्तों की तल्खियाँ कहतींफ़ासले क्यूँ हैं दरमियाँ कहतीं
सीख ले हमसे मोहब्बत का हुनरफूल पर बैठी तितलियाँ कहतीं
भेज दें फिर से हमें दरिया मेंकाँच में क़ैद मछलियाँ कहतीं
हम अगर हैं तो समझो जन्नत हैहमसे मासूम बेटियाँ कहतीं
खुशबुएँ कितनी उसके दामन मेंआज भी मेरी उंगलियाँ कहतीं
दर पे बादे सबा ने दस्तक दीखोल दो हमको खिड़कियाँ कहतीं
देखिये कर के इक नई कोशिशहमसे हर बार ग़लतियाँ कहतीं
ज़ुल्म की ये भी तो शिकायत हैहमसे ख़ामोश सिसकियाँ कहतीं
तुम बड़े वो हो, हम न बोलेंगेप्यार से उसकी झिड़कियाँ कहतीं
और लज़्ज़त, कहीं है दुनियाँ में?नर्म हाथों की रोटियाँ कहतीं
मेरे दीदार के बनो क़ाबिलचिलमनों से ये झलकियाँ कहतीं
दूर रक्खें हमें सियासत सेजोड़ कर हाथ बस्तियाँ कहतीं
इक सुख़नवर शहर में है तनहाअब रिसालों की सुर्खियां कहतीं



ग़ज़ल-
गुज़ारे भर को ईमां से कमाई आ ही जाती हैअगर इफ़रात हो दौलत, बुराई आ ही जाती है
ये माना झूठ का दुनिया में कारोबार फैला हैलबों पे फित्रतन मेरे सच्चाई आ ही जाती है
अगर पकवान हों महँगे, ये शक्कर फाँक लेते हैंज़ुबां पर मुफ़लिसों के यूँ मिठाई आ ही जाती है
यहाँ हर शख्स फ़ानी है सभी हैं जानते लेकिनजुदा हो गर कोई अपना रुलाई आ ही जाती है
ख़ुदा ने खोल रक्खे हैं जहां में इश्क़ के मक्तबसभी को यूँ मोहब्बत की पढ़ाई आ ही जाती है
जवानी करती है मन की ये कुनबा फिर भी कायम हैबुज़ुर्गों में तो सहने की समाई आ ही जाती है
बहुत कमियां मेरे एह्बाब में है, लोग कहते हैंमेरे अशआर में उनकी बड़ाई आ ही जाती है
अदा बस फ़र्ज़ ही करना यहाँ उम्मीद रखने सेक़रीबी रिश्तों में भी कुछ खटाई आ ही जाती है
रवादारी के जज़्बे से जो कोई काम करता हैदुआएँ मुफ़्त मिलती हैं, बधाई आ ही जाती है
अभी इस जिस्म से सबको ज़रूरी काम लेने हैंहमारे नाश्ते के संग दवाई आ ही जाती है
ऐ ज़ाहिद माफ़ करना हम तुझे अब सुन न पाएंगेअगर तक़रीर हो लंबी जम्हाई आ ही जाती है
अदावत की ये आतिश तो जलाकर ख़ाक करती हैमुहब्बत की हरारत से भलाई आ ही जाती है
करेगा वो मदद अपनी यक़ीनन कह नही सकतेइबादत से मगर दिल में सफाई आ ही जाती है


आप तो रिश्तों में भी चालाकियाँ करते रहे
हम ज़माने के लिए नादानियाँ करते रहे
हम बदल जाते बदल जाती फ़िज़ा इस दौर की
सब बदल जाए यही ग़ुस्ताख़ियाँ करते रहे
जिन युवाओं के भरोसे देश की तक़दीर है
वो नशे में चूर हो शैतानियाँ करते रहे
राहे-उल्फ़त थी कठिन दुश्मन ज़माना था मगर
उम्र भर दिल की सुनी मनमानियाँ करते रहे
अब ये जाना झूठ का चेहरा चमकता है यहाँ
हम मगर सच कहने की गुस्ताख़ियाँ करते रहे


खूबसूरत वादियों का जब नज़ारा हो गयाफिर तुम्हारी याद का रौशन सितारा हो गयाकर दिया था मौज ने कश्ती को तूफां की नज़रआप माँझी बन के आए तो किनारा हो गयापहले तो कहता रहा सच कहना जो भी कहना तुमसच कहा तो ये जहां दुश्मन हमारा हो गयाबंद हमने कर लिए आँखों में गुलमंज़र तमामरात उसकी हो गई और दिन हमारा हो गयाएक ऐसा मोड़ आया ज़िंदगी में 'आरती'हम किसी के हो गए कोई हमारा हो गया


ग़ज़ल-
जबसे तहदार हो गया हूँ मैंएक शाहकार हो गया हूँ मैं
ख़ुद से उलझा तो ये समझ आयाकितना दुश्वार हो गया हूँ मैं
जबकि सालिम हूँ फिर भी लगता हैजैसे मिसमार हो गया हूँ मैं
होश की बात अब नहीं करताक्या समझदार हो गया हूँ मैं?
मुन्तख़ब इश्क़ ने किया मुझकोऔर गुनहगार हो गया हूँ मैं

ग़ज़ल-

निजात-ए-दर्द पाना चाहती हैतबीयत मुस्कुराना चाहती है
ये कैसा दौर आख़िर आ गया हैशराफ़त मुँह छुपाना चाहती है
इलाही क़ुव्वत-ए-परवाज़ दे देहवा बाज़ी लगाना चाहती है
नहीं गर ज़िन्दगी बेज़ार मुझसेतो क्यूँ पीछा छुड़ाना चाहती है
शजर हूँ 'आस' मैं वो रह गुज़र काजिसे आँधी गिराना चाहती है

सारी खुशियों को सरेआम झटक कर रोयेमेरे सपने मेरी आँखों से छलक कर रोयेतेरी आगोश में सर रक्खा, सिसक कर रोयेहम भी बच्चों की तरह पाँव पटक कर रोयेरास्ता साफ़ था, मंज़िल भी बहुत दूर न थीबीच रस्ते में मगर पाँव अटक कर रोयेजिस घड़ी क़त्ल हवाओं ने चराग़ों का कियामेरे हमराह जो जुगनू थे फफ़क कर रोयेअपने हालात बयां करके जो रोई धरतीचाँद तारे किसी कोने में दुबक कर रोयेक़ीमती ज़िद थी, गरीबी भी भला क्या करतीमाँ के जज़्बात दुलारों को थपक कर रोयेबामशक्कत भी मुकम्मल न हुई मेरी ग़ज़लचंद नुक्ते मेरे काग़ज़ से सरक कर रोये
ग़ज़ल
इश्क़ का क्या हुआ है असर देखियेआप ही आप हैं अब जिधर देखियेवो नज़र में नहीं फिर भी मौजूद हैहर तरफ जल्वागर है जिधर देखियेपत्थरों को तराशा ख़ुदा कर दियाक्या न पाया बशर ने हुनर देखियेफूल मसले गए शोर गुलशन में हैसिर्फ है बागबाँ बेखबर देखियेउसके हक़ में दुआएं किये जाइयेजब भी कोई शजर बा-समर देखियेमाँ ने नज़रें उतारी मुझे चूमकरसब बलाएँ हुईं बेअसर देखियेमैं वो मौसम नहीं जो गुज़र जायेगायाद आऊंगा और भूलकर देखिये
ग़ज़ल

किसी बहाने से ऐसे वो मेरे शाने लगेचराग़े-इश्क फ़ज़ाओं में झिलमिलाने लगेखुदाया ऐसा असर दे मेरी मोहब्बत कोदुआ को हाथ उठे और नज़र वो आने लगेहम अपने आप को दीवार कर नहीं सकतेफ़सीले-जिस्म को ये सोचकर गिराने लगेबहुत गुरुर था हमको तेरी मोहब्बत परमगर ये अच्छा हुआ होश तो ठिकाने लगे'अमर अमान' इसी सोच में हूँ क्यों आखिरमेरे रक़ीब मोहब्बत से पेश आने लगे
ग़ज़ल
मय-मयखाना ठीक नहींठौर ठिकाना ठीक नहींआवारा गलियों में यूँआना-जाना ठीक नहींइन अँधियारो की जानिबपाँव बढ़ाना ठीक नहींदर्द नया जां को दे जोमीत पुराना ठीक नहींलोग कुरेदेंगे इनकोघाव दिखाना ठीक नहींहर-सू है जब घोर अँधेरदीप बुझाना ठीक नहींनाम हथेली पर लिख-लिखरोज़ मिटाना ठीक नहीं

आग को यूँ हवा नहीं देतेप्यार से क्यूँ बुझा नहीं देतेक़ामयाबी क़दम नहीं छूतीमाँ-पिता गर दुआ नहीं देतेछोड़ते हम नहीं  हैं दुश्मन कोयार को हम दग़ा नहीं देतेबेनियाज़ी करे तुम्हारी जोतुम उसे क्यूँ भुला नहीं देतेउस ग़ज़ल को कहूँ मुकम्मल क्याहर्फ़ जिसके रुला नहीं देते
ग़ज़ल
देर तक माटी के संग सजदा हुआ है धूप मेंखेतिहर से बीज तब बोया गया है धूप मेंजेठ की इस दोपहर में नींद क्यूँ आती नहींवो परिन्दा दर-ब-दर क्या खोजता है धूप मेंहाथ में रस्सी बंधी है और रूखे बाल हैंएक पागल बैठकर क्या सोचता है धूप मेंगंध होती क्या बदन की शख्स वह कह पाएगाछाँव का जो आशियाना टाँकता है धूप मेंबूँद माथे से टपककर दास्तां उसकी कहेजो फ़लों और सब्ज़ियों को बेचता है धूप में
ग़ज़ल

हैं दरीचे न खिड़कियाँ घर मेंक्यूँ भला ख़ुश हों बच्चियाँ घर मेंअब हवाओं में दहशतें हैं बहुतचुप-सी बैठी हैं तितलियाँ घर मेंखोल ही देगी पोल रिश्तों कीबढ़ रही हैं जो दूरियाँ घर मेंआज गूगल का है ज़माना हुज़ूरकौन लाता है पोथियाँ घर मेंलाडली जब गयी है अपने घरबेसबब क्यूँ हैं सिसकियाँ घर में
ग़ज़ल
कभी तो ज़िक्र छेड़ो ना सनम गुज़रे ज़माने काजिगर लाओगे कैसे तुम ज़िया को भूल जाने काहवाओं से तेरा चर्चा किया करते थे हर इक पलयही तो इक तरीका था तुझे वापस बुलाने काबड़ी पोशीदगी से इश्क़ का इज़हार करते होहुनर सीखा कहाँ से तुमने इस दिल को जलाने कावफ़ाओं की ज़मीं पर इश्क़ का इक घर बनायेंगेमुहब्बत नाम रक्खेंगे हम अपने आशियाने कामेरी हिचकी बताती है मुझे तुम याद करते होतरीक़ा ख़ूब है ये भी सनम मुझको सताने का

ग़ज़ल
ये सब करिश्मे हैं चाहतों के, हमारे दिल ऐसे मिल रहे हैंहवा में ख़ुशबू घुली हुई है, खिज़ा में भी फूल खिल रहे हैंहसीन शब ये थमी-थमी है, नज़र हया से झुकी झुकी हैखिले हुए ये कँवल गुलाबी, तुम्हारे होठों से सिल रहे हैंज़रा-सी नज़दीकियाँ बढ़ीं हैं, निगाहें आपस में मिल रही हैंज़रा ज़रा-सा चढ़ा है नश्शा, बहक हमारे ये दिल रहे हैंतुम्हारा आना ग़ज़ब हुआ रे, ये दिल दिवाना अजब हुआ रेमिले हैं इक दूसरे से ऐसे, कि जैसे हम तुम सलिल रहे हैंकभी तो डिंपल करे दिवाना, कभी यूँ हौले से मुस्कुरानानज़र लगे न 'ज़िया' तुम्हें हम, तुम्हारे गालों का तिल रहे हैं

ग़ज़ल-

बढ़ा दिए हैं तो वापस क़दम नहीं करनामिले न साथ किसी का तो ग़म नहीं करना
तुझे वफ़ा का सिला क्या मिला ज़माने सेये सोचकर तू कभी आँख नम नहीं करना
तमाम उम्र ही लग जाए भूलने में उसेकिसी ग़रीब पे इतना करम नहीं करना
ख़ुदा की राह पे चलते हुए किसी सूरततू अपनी ज़ात पे कोई भरम नहीं करना
इन आँधियों की भी औक़ात देख लेने देमुझे बचा के तू मुझ पर सितम नहीं करना


ग़ज़ल-

मेरी ग़ज़ल या नज़्म, रुबाई, सब मिट्टी
तुझ तक ही जब पहुँच न पाई, सब मिट्टी
कैसे-कैसे ख़्वाब सँजोए जीवन भर
कैसी-कैसी आस लगाई, सब मिट्टी
जंगल-जंगल भटके तेरी चाहत में
दर-दर की ठोकर भी खाई, सब मिट्टी
हँस-हँस कर दुख-दर्द छुपाए दुनिया से
पत्थर-दिल पर जान लुटाई, सब मिट्टी
क़ब्रों पर लिख लो तहरीरें लाख मगर
इज़्ज़त, शोह्रत, मान, बड़ाई, सब मिट्टी

ग़ज़ल-

लिखा तो है किताबों में बुराई हार जाती हैमगर इस घोर कलियुग में भलाई हार जाती है
कचहरी, कोर्ट, थाने में नहीं चलती ग़रीबों कीमियाँ अक्सर अदालत में सचाई हार जाती है
बहू की मँहगी साड़ी से, कभी बेटे की बोतल सेमहज दस-बीस की माँ की दवाई हार जाती है
कफ़न की जेब में जायेगी केवल पुण्य की दौलतख़ुदा के घर में हर काली कमाई हार जाती है
पहनकर संत का चोला उड़ाते मौज पाखण्डीमगर जब पोल खुलती है ख़ुदाई हार जाती है
कमा कुछ नेकियाँ 'अनजान' आख़िर काम आएँगीख़ुदा की उस अदालत में बुराई हार जाती है

ग़ज़ल-

विरासत को बचाने गाँव के खण्डहर बुलाते हैंशहर वालों तुम्हें पुरखों के बूढ़े घर बुलाते हैं
समझकर तुम जिन्हें बेजान पत्थर छोड़ आए होवो आँगन राह तकता है, ये बामो-दर बुलाते हैं
चिता को अग्नि देना ही नहीं बस धर्म बेटे कादवा बिन खाँसती अम्मा के कातर स्वर बुलाते हैं
मिलेगी दाल-रोटी पर बहुत ही स्वाद आएगाख़ुशी को बाँटकर खाते हुए लंगर बुलाते हैं
गली, चौपाल, वे पनघट, सुहानी छाँव पीपल कीयहाँ बदला नहीं कुछ भी वही मंज़र बुलाते हैं
कभी 'अनजान' शहरों से निकलकर गाँव तो आओगले अपने लगाने को तुम्हें छप्पर बुलाते हैं

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